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Tuesday, September 15, 2009

शब्द नहीं जानते...


बहुत पुरानी बात है,
शब्द के जन्म से पहले शायद,
या फिर उस से भी पहले की
जब शब्द के होने का आभास नहीं था शायद….

जब सुबह, चिड़िया के परों में उलझ जाती थी
जब फूलों से गुदगुदी हवा बहुत गुनगुनाती थी
जब उस छोर के तारे इस और के चेहरे सहलाते थे
और झोली भर कहानियां बुन जाते थे
जब बसेरा नदी के पास ही था सब का
और गुनगुने पानी का गीत भी था बराबर सब का
जब खुशी अपने होने का चिन्ह
मुस्कराहट पर बिछा जाती थी
और अजनबी हर एक टीस
आंखों को हल्का कर जाती थी
तब, सब बातें जीवित थीं
धड़कन भी सुनाई देती थी उनकी…

और फिर एक दिन
शब्द ने आ कर
शोर कर दिया हर आहट में
और गीत डूब गए
शब्दों की बुनावट में...

लेकिन
अभी भी,
कभी कभी
जो बातें शब्द नहीं ओढ़ पातीं
वो कह जाया करती हैं सब कुछ
मुस्कुराहटें लौटा लाती हैं
और आंखों का पानी भी शायद...

अमलतास का गीत

वो अमलतास देखते हो? वो ना  झूम कर  बांहे फैलाये  हवाओं की हथेलियों पर  सूरज की छननी से ढ़ांप कर  एक गीत  भेजता है हर सुबह  मेरी ओर.  पर  वो ग...