

एक और बसंत
एक पत्ता,
अटका सा है कहीं
गिरने को है,
बस अभी… बस अभी…
फिर भी जुदा है अपनी डाल से…
एक पत्ता.
हवा सन्न-सन्न कर डरा जाती है,
कई पड़ोसी पत्तों को बुझा जाती है,
सूखा सा यह एक पत्ता
हड्डियों का सिकुरा सा ढांचा,
भयभीत और भुझा,
फिर भी साँस बुन लेता है,
किसी आर्शीवाद से माँगा हुआ…
एक पत्ता,
पतझड़ का,
यूँ ही साँस बटोरा करता है,
एक और बसंत की आस में.
(Came wafting in, like its own leaf, 5 minutes back... April 19, 2009, 12.55)