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Monday, April 13, 2009

मार्च का पत्ता (आखिरी क्षण)

काँपता सा,
हवा की सरसरी से सहमा,
बिन हाड मांस, बीमार सा
अचानक की बौछार
और कभी बे-तुके ओलों से झेंपता,
ज़रा जिंदा रहता सा
तपती दोपहरों की राह बटोरता... जब न तो हवा चले न सड़कें,
हवा की सरसरी से सहमा
वोह बिन हाड मांस का पत्ता…
आज पाँच बजने के बारह ‘मिनट’ पहले
हल्का सा हिला
और टूट गिरा अपने एक बरस के पेड़ से…
वोह ‘मार्च’ का पत्ता,
सूखा, सिंकुरा, मुर्दा सा
छोड़ आया आज आसमान की ऊंचाई.

(March 19, 2007 1.48 am)

चाँद उजड़ा सा

आसमान से दूर
ज़मीन के बहुत करीब
एक भूला भटका सा,
चाँद लटका सा...
कभी पेड़ की आड़ लेता,
तो कभी टीन की छत से छिपता
कभी चलती गाड़ी की खिड़की से चढ आता
तो कभी घर के पिछवारे में जा गिरता
पानी में तैरता
साथ साथ चलता
तो कभी जम जाता रात की उनींदी आंखों में...
कभी यूँ ही झांकता मस्ताया बच्चा सा,
आसमान के उस छोर से.
सब अथ्केली और उजाली रातों के बाद,
आज का चाँद है चुप, अकेला, पिघला सा....
जैसे रंग भर कर उस में
हाथ से मिटा दिया हो किसी ने.

April 4, 2007, 12.08 am

चुप (SILENCE)

चुप (SILENCE)

तुम, मैं और हमें कोसों दूर करते शब्द

गुच्छों में,

कभी अकेले,

बिर्हबान जंगल की रात से,

अधूरे, कटे से, मीठे, खट्टे, करारे और कड़वे…

और उनके बहुत से गुच्छे

हमें कोसों दूर करती बातें

बहुत सी बातें...

सुबह सुबह की धीमी, ओसी बातें

रात की दबी दबी सी चुपकी सी बातें

और सारे दिन और पहरों को भरती बातें

हमें कोसों दूर करतीं हजारों हजारों बातें.

घड़ी, दौड़ और काम

रोटी, पैसा और नाम

और न जाने... तुम्हें और मुझे दूर करतीं कितनी बातें.

चलो आज सब को पार कर जाएँ

तुम और मैं चुप हो जाएँ.

March 19, 2007, 12.56 am

अमलतास का गीत

वो अमलतास देखते हो? वो ना  झूम कर  बांहे फैलाये  हवाओं की हथेलियों पर  सूरज की छननी से ढ़ांप कर  एक गीत  भेजता है हर सुबह  मेरी ओर.  पर  वो ग...