काँपता सा,
हवा की सरसरी से सहमा,
बिन हाड मांस, बीमार सा
अचानक की बौछार
और कभी बे-तुके ओलों से झेंपता,
ज़रा जिंदा रहता सा
तपती दोपहरों की राह बटोरता... जब न तो हवा चले न सड़कें,
हवा की सरसरी से सहमा
वोह बिन हाड मांस का पत्ता…
आज पाँच बजने के बारह ‘मिनट’ पहले
हल्का सा हिला
और टूट गिरा अपने एक बरस के पेड़ से…
वोह ‘मार्च’ का पत्ता,
सूखा, सिंकुरा, मुर्दा सा
छोड़ आया आज आसमान की ऊंचाई.
(March 19, 2007 1.48 am)
Showing posts with label 1.48 am). Show all posts
Showing posts with label 1.48 am). Show all posts
Monday, April 13, 2009
Subscribe to:
Posts (Atom)
अमलतास का गीत
वो अमलतास देखते हो? वो ना झूम कर बांहे फैलाये हवाओं की हथेलियों पर सूरज की छननी से ढ़ांप कर एक गीत भेजता है हर सुबह मेरी ओर. पर वो ग...
-
Someone is trapped in my body. Or I am trapped in a body. This Someone, trapped in, keeps growing new wings every secret flash. And when I a...
-
एक और बसंत एक पत्ता, अटका सा है कहीं गिरने को है, बस अभी… बस अभी… फिर भी जुदा है अपनी डाल से… एक पत्ता. हवा सन्न-सन्न कर डरा जाती है, कई पड़...
-
Sometimes, everything fits. Sometimes everything looks easy… Sometimes, impossible mountains collapse. Sometimes, scalding suns turn moons. ...